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Sunday, April 20, 2025

काँच

काँच सी मुरादें पूरी करता हूँ मैं

ज़िंदगी जब भी आती है, शीशा तोड़ देता हूँ मैं


ढूँढो क्या बिकता है बाज़ारों में

मैंने तो ज़र्फ़ कमाई है

चले थे सपनों का सेहरा उठाए

कमज़र्फ़ियाँ बीच में आई हैं


मशकूक लोग हैं यहाँ

ज़िंदादिली से डरते हैं

इन शहरों में जब भी निकलता हूँ

लोग परवाने-सा जलते हैं


मेरे अपने कहते हैं पराया हूँ मैं

मौसीक़ी की महफ़िल ने पहचाना है

याद रखना दुनियावालो

वो नाम “शिवा सिराज” जो

बतलाया है


ये जो ज़िंदगी काँटों-सी चुभती है

काँच से पूछना, उसको कैसी लगती है 

                                                                - siva

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