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Sunday, April 20, 2025

डर एक आदमी है

किसने कहा डर एक औरत है

डर तो एक आदमी है

और आदमी है, तभी तो लाज़मी है


डर एक आदमी है

तभी तो बेखौफ़ घूमता है बाज़ारों में

दिन हो या रात हो

उसे कौन सताएगा, उसे कौन तड़पाएगा


कभी देखा है डर को?

बड़ा सरल सा दिखता है

सुंदर नैन-नक्श, भारी शरीर

सूट-बूट पहने रोज़ निकलता है


हमें डर को औरत बनाना है

उसे डराना है, उसे धमकाना है

जो बाहर मिले वो ख़ुशी

और घर आकर कोहराम मचाना है


हमें डर को औरत बनाना है

मन से बाहर मगर घर से नहीं

तन से बाहर मगर रण से नहीं


हमें डर को औरत बनाना है

जो करती रहे सबका काम

उसे क्यों पुचकारना है?


हमें डर को औरत बनाना है

उसे एक दर्जा देकर

फिर भूल जाना है


हमें डर को आदमी से औरत बनाना है                          

                                                                       - siva


This poem is a mirror to patriarchy, using the metaphor of fear as a gendered construct.Through sarcasm and stark imagery, the poem questions this deep-rooted mindset. 

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