आज कलम उठाई रुसवाई
सोच में पड़ गई तन्हाई
है उसका दिन की रिहाई
बेड़ियों में बँध गई
वो ख़्वाबों की प्याली
आज आई… वो हरजाई
दूर कहीं, पास भी
शोर में और भीड़ में
लाल धागे में गाँठ लगी
कटते-मरते रुक के देखा
गले पड़ गई…परछाईं
खींच के देखा, चिल्ला के सुना
कोई… आवाज़ न आई
आज कलम उठाई रुसवाई
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