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Wednesday, July 1, 2026

क्या लिखूँ ?

क्या लिखूँ, सच कह दूँ या झूठ लिखूँ
वो पैर पड़ गया मेरे, खाने एक निवाले को।
कहता — "सुबह से कुछ नहीं खाया साहब।"
झूठ लिखूँ तो कल ही खाना चुरा के खा रहा था।

क्या लिखूँ, सच कह दूँ या झूठ लिखूँ
वो बोली — "भैया, एक चप्पल दिला दो।"
नंगे पैर चल नहीं पाते।
झूठ लिखूँ तो आज ही तपती सड़क पे कलाबाज़ियाँ दिखा रही थी।

क्या लिखूँ, सच कह दूँ या झूठ लिखूँ
वो ताली बजा के पैसा माँगे, बोले — "आशीर्वाद मिलेगा।"
कहते, तरक़्क़ी होगी, घरवाले आगे बढ़ेंगे।
झूठ कहूँ तो उसका अपना घर जूझ रहा था।

अब बोलो, क्या लिखूँ, सच लिखूँ या झूठ लिखूँ।
आँखों से जो देखा या मन से जो महसूस किया।
ये मन का देखा सच है,
या आँखों का फ़साना।
ये सच की कोई साज़िश थी,
या झूठ का कोई बहाना।
क्या लिखूँ? सच कह दूँ या झूठ लिखूँ।

— सिवा

 

The poem isn't really about truth vs. lie.

It's about surface vs. context.

The "jhuth" isn't a lie at all. It's the other half of the truth.

 

1 comment:

  1. kya likhu bolte hue kya hi likha diye malik

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